Sunday, March 30, 2008

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बेकाबू होने लगीं महंगाई की लपटें...
चाहे वह धातु हो, खाद्य वस्तु, सब्जियां या खाद्य तेल...सबकी कीमतों में आग लगी हुई है।

कमोडिटी एक्सचेंजों के कारोबार में उछाल-
देश में कमोडिटी एक्सचेंजों के कारोबार में 9.82 फीसदी का उछाल दर्ज किया गया है।

वर्तमान वित्त वर्ष में 15 मार्च तक यह आंकड़ा 38,53,524 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है जबकि पिछले साल की इसी अवधि में यह 35,08,856 करोड़ रुपये था। एक मार्च से 15 मार्च तक राष्ट्रीय स्तर के तीनों एक्सचेंजों और 20 क्षेत्रीय एक्सचेंजों में कारोबार में 41.49 फीसदी का इजाफा हुआ है और यह एक साल पहले के मुकाबले 2,57,675 करोड़ रुपये के स्तर पर आ गया है। फॉरवर्ड मार्केट कमिशन (वायदा बाजार आयोग) ने एक बयान में यह जानकारी दी है।

कोयला खान खरीदेगी टाटा पावर

टाटा मोटर्स और टाटा केमिकल्स की अधिग्रहण मुहिम पूरी होने के बाद अब टाटा पावर ने भी ताल ठोक ली है। कंपनी विदेशों में कुछ कोयला खदानों के अधिग्रहण की ताक में है।

कंपनी के वरिष्ठ प्रबंधकों की एक बैठक में इस बात का खुलासा किया गया कि टाटा की नजर छोटी खानों के अधिग्रहण पर है। इसी मुहिम के चलते एक नई कोयला खदान खरीदने की प्रक्रिया जोरों पर है। हालांकि कंपनी प्रबंधन ने इस बारे में विस्तृत जानकारी नहीं दी लेकिन टाटा पावर के प्रबंध निदेशक प्रसाद मेनन ने कहा कि कंपनीर् कई संभावनाएं टटोल रही है।

दरअसल कीमत में इजाफे की वजह से टाटा के मुंद्रा बिजली संयंत्र के लिए कोयले की आपूर्ति पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इस संयंत्र के लिए कोयले की आपूर्ति इंडोनेशिया स्थित कोयला खानों से की जानी है और यह काम 2012 में पूरा हो जाएगा।

टाटा पावर फिलहाल गुजरात के मुंद्रा में एक अल्ट्रा मेगा बिजली परियोजना पर काम कर रही है। कंपनी की विशेष उद्देश्य वाली कंपनी कोस्टल गुजरात पावर लिमिटेड के जरिए पूरा कर रही है। 4000 मेगावाट क्षमता वाले इस संयंत्र के लिए सालाना करीब 50 लाख टन कोयले की जरूरत होगी जिसमे से 30 लाख टन कोयला तो इंडोनेशियाई खानों से निश्चित कीमत पर मिलेगा। बाकी 20 लाख टन के लिए कं पनी को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है।

टाटा पावर ने अप्रैल 2007 इंडोनेशिया की दो कोयला खानों में 30 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी थी और इसके लिए 4,400 करोड़ रुपये चुकाए थे। कंपनी प्रबंधन का कहना है कि कोई भी अधिग्रहण पूरी तरह से तोलमोल के बाद ही किया जाएगा।
भारतीय रिफाइनरी कंपनियों के लिए खुला मौकों का पिटारा
दुनिया भर में रिफाइनरी कंपनियों के विस्तार की योजनाओं में देरी से होने वाले लाभ का फायदा उठाने के लिए भारतीय कंपनियां अपने विस्तार की योजना बना रही हैं।

चाहे रिलायंस हो या एस्सार, इस मौके को र्कोई चूकने के लिए तैयार नहीं है।भारत की सबसे बड़ी और दुनिया की तीसरे नंबर की रिफाइनरी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड अपनी हालिया क्षमता बढ़ाने के लिए प्रति वर्ष 3.4 करोड़ टन उत्पादन करने वाली नई रिफाइनरी खरीदने की संभावनाएं तलाश रही है। अभी कंपनी की उत्पादन क्षमता 3.3 करोड़ टन प्रति वर्ष है और कंपनी की गुजरात में सालाना 2.7 करोड़ टन क्षमता वाली रिफाइनरी भी जल्द ही शुरू होने वाली है।

एस्सार ऑयल भी इस मौके का फायदा उठाने में पीछे नहीं रहना चाहती है। इसलिए कंपनी अपनी रिफाइनरी की क्षमता को 1.05 करोड़ टन से बढ़ाकर 3.4 करोड़ टन प्रति वर्ष करने की योजना बना रही है। कंपनी इस अतिरिक्त क्षमता को निर्यात करने की योजना बना रही है।नई रिफाइनरी स्थापित करने में होने वाली देरी के चलते वैश्विक रिफाइनिंग बाजार में मांग और आपूर्ति के बीच अंतर बढ़ने से उत्पाद कीमतों में भी वृद्धि हुई है।

अर्नस्ट ऐंड यंग के कारोबारी सेवाओं के सलाहकार और पार्टनर अजय अरोड़ा ने बताया कि निकट भविष्य में भी इन कीमतों में कोई कमी आने की संभावना नहीं है। आने वाले पांच साल में भारतीय बाजार में इन उत्पादों की कीमतों में लगभग 250 से 320 रुपये प्रति बैरल तक की बढ़ोतरी संभव है। सिंगापुर में इस उत्पाद की कीमत प्रति बैरल 80 रुपये कम है। भारत में कीमत औसतन 280 से 320 रुपये तक है।

रिफाइनिंग उत्पादों की बढ़ती कीमतों के कारण भारतीय कंपनियां अपनी विस्तार योजनाओं को पूरा करने में जुट गई हैं। भारतीय कंपनियां साल 2010 तक समूचे विश्व में पेट्रोलियम उत्पादों की मांग और आपूर्ति के अंतर को कम करने के लिए अगले पांच साल में लगभग 70,000 करोड़ रुपये खर्च करेंगी। मांग और आपूर्ति के बीच लगभग 11.2 करोड़ टन का सालाना अंतर है।

पश्चिम एशिया में लगभग 10 करोड़ टन क्षमता की रिफाइनरी की स्थापना में हो रही देरी के कारण भी भारतीय कंपनियों के लिए संभावनाएं बढ़ रही हैं।

वैश्विक संभावनाएं

रिफाइनिंग कंपनियों के सूत्रों के अनुसार भारतीय रिफाइनरियों की क्षमता बढ़ने से पश्चिम एशिया में लगने वाली महंगी रिफाइनरियों की मांग अब कम हो गई है। पश्चिम एशिया में लगने वाली रिफाइनरियों के लिए उपकरणों की बढ़ती लागत के कारण भी इनके शुरू होने में देरी हो रही है।जानकारों के अनुसार पश्चिम एशिया में श्रमिकों पर होने वाला खर्च भारत की तुलना में लगभग दोगुना होता है।

चीन की रिफाइनरियों की कुल क्षमता लगभग 30 करोड़ टन प्रति वर्ष है। आने वाले दो-तीन साल में यह क्षमता लगभग 45 से 50 करोड़ टन प्रतिवर्ष हो जाने की संभावना है। इस बढ़ी क्षमता से स्थानीय मांग की आपूर्ति की जाएगी।पिछले पांच साल में पेट्रोलियम उत्पादों की वैश्विक मांग में लगभग 2.5 फीसदी की वृद्धि हुई है। जबकि रिफाइनिंग क्षमता में 0.7 फीसदी की मामूली वृद्धि ही हुई है। सख्त पर्यावरण कानूनों के चलते अमेरिका और यूरोप में पिछले 20 साल से एक भी रिफाइनरी नहीं लगाई है।

रिलायंस 3.3 करोड़ टन की क्षमता वाली रिफाइनरी को पूरी तरह निर्यात केंद्रित करना चाहती है। एक नई रिफाइनरी के प्रबंध निदेशक ने बताया कि रिलायंस और एस्सार जैसी कंपनियां क्षमता को निर्यात करने के उद्देश्य से बढ़ा रही हैं। इससे बाकी कंपनियों को घरेलू बाजार की बढ़ती मांग को पूरा करने का अवसर मिलेगा।

आईपीओ से जुड़े मुद्दों पर सेबी की नजर

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) जुलाई में दो महत्त्वपूर्ण फैसलों पर अपनी मुहर लगा सकता है।

इनमें आईपीओ के लिए अभिदान यानी सब्सक्रिप्शन के लिए आईपीओ बंद होने की तिथि और लिस्टिंग के बीच लगने वाले समय को कम करना और क्वालिफाइड इंस्टियूशनल बायर्स (क्यूआईबी) सहित सभी श्रेणियों के निवेशकों से आईपीओ आवेदन के दौरान पूरा भुगतान करने की मांग शामिल है।

इस समय क्यूआईबी को आईपीओ में सब्सक्रिप्शन कराने के लिए कुछ ही मार्जिन का भुगतान (बुक-बिल्डिंग मूल्य-ब्रांड का करीब 10 फीसदी) करना पड़ता है। लेकिन खुदरा निवेशकों को सब्सक्रिप्शन के लिए पूरा भुगतान करना जरुरी है। हालांकि खुदरा निवेशकों को शेयर आवंटित नहीं किए जाने पर आईपीओ के बंद होने के 15 दिनों के भीतर भुगतान की गई राशि को वापस कर दिया जाता है। विदेशी संस्थानों और संस्थागत निवेशकों को ही क्यूआईबी कहा जाता है।

सेबी से जुड़े सूत्रों ने बताया कि सेबी इन दो मुद्दों को जल्द से जल्द निपटाना चाहता है लेकिन सेबी द्वारा अंतिम फैसला जुलाई तक ही लिया जा सकेगा। बहरहाल, इन मुद्दों को लेकर सेबी द्वारा कुछ कागजी कार्रवाई भी की जानी बाकी है। यही नहीं अंतिम फैसले पर मुहर लगने से पहले बोर्ड के समक्ष बाजार के फीडबैक को भी रखा जाएगा। सूत्रों ने बताया, ''जुलाई तक फैसला ले लिया जाएगा।''

सेबी के अध्यक्ष सी. बी. भावे ने हाल ही में सिंगापुर में आयोजित एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा था कि नियामक (रेगुलेटर) आईपीओ में क्यूआईबी के निवेश संबंधी प्रावधानों में तब्दीली लाना चाहता है।

सूत्रों के मुताबिक क्यूआईबी द्वारा दिए गए फीडबैड के अनुसार उनमें से ज्यादातर लोगों से प्राप्त धन का निवेश करते हैं और आईपीओ के लिए पूरा भुगतान तभी संभव हो सकता है जब देश में शेयर आवंटन और लिस्टिंग प्रक्रिया के बीच लगने वाले समय-सीमा को कम कर दिया जाए। निस्संदेह भारतीय कंपनियों के लिस्टिंग प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए क्यूआईबी द्वारा दिए गए फीडबैक ने नियामक को काफी प्रोत्साहित किया है।

यह भी उम्मीद की जा रही है कि अप्रैल के शुरू में सेबी की प्राथमिक बाजार समिति (प्राइमरी मार्केट कमिटी) की एक बैठक बुलाई जाएगी। यह समिति आईपीओ के बंद होने की तारीख और उसके लिस्टिंग के बीच के समय को कम करने संबंधी मुद्दों पर चर्चा करेगी। इस समिति के समक्ष चर्चा के लिए तैयार किए गए परामर्श मसौदों को भी पेश किया जाएगा। इस बैठक के आधार पर ही सेबी बोर्ड अपना अंतिम फैसला लेगा।

इसमें कोई शक नहीं कि सेबी द्वारा इस दिशा में उठाए जाने वाले प्रभावशाली कदम से क्यूआईबी और छोटे खुदरा निवेश एक ही पायदान पर खड़े नजर आएंगे। मसलन जब वे दोनों आईपीओ के लिए आवेदन भरेंगे तो उनमें भुगतान को लेकर कोई अंतर नहीं रखा जाएगा।

रिलायंस पावर का 'पावरफुल' ऑर्डर

रिलायंस पावर जल्द ही एक और धमाका करने वाली है। अनिल धीरूभाई अंबानी समूह की यह कंपनी अपने बिजली संयंत्रों के लिए दुनिया का सबसे बड़ा ऑर्डर देने के लिए तैयार है।

तकरीबन 10,000 करोड़ रुपये के इस ऑर्डर में संयंत्रों के लिए 12 बॉयलर, टर्बाइन और जेनरेटर खरीदे जाएंगे। इन उपकरणों के लिए दुनिया भर में अब तक कभी इतना बड़ा ऑर्डर नहीं दिया गया है।

जब ऑर्डर इतना बड़ा है, तो उसे लपकने के लिए मारामारी मचनी लाजिमी है। बॉयलर और टर्बाइन बनाने वाली 5 नामी कंपनियां इटली की अंसाल्दो, कोरिया की दूसान, जापान की तोशीबा, चीन की शांघाई इलेक्ट्रिक और रूस की पावर मशीन्स यह ऑर्डर हासिल करने के लिए होड़ में हैं। सूत्रों के मुताबिक कुल मिलाकर यह ऑर्डर 8,000 मेगावाट बिजली क्षमता के लिए होगा।

इन वैश्विक कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारी ठेके के लिए खुद मुंबई में डेरा डाल चुके हैं। रिलायंस पावर के साथ उनकी बातचीत अंतिम दौर में है। कंपनी के सूत्रों की मानें, तो एक दो दिन में ही ऑर्डर का पूरा खुलासा कर दिया जाएगा। शर्तों के तहत ऑर्डर जीेतने वाली कंपनी को चार-पांच साल में ही उपकरणों की आपूर्ति करनी होगी।रिलायंस पावर ये उपकरण खास तौर पर सासन और कृष्णापट्टनम की अल्ट्रा मेगा पावर परियोजनाओं के लिए मंगा रही है। सासन में कंपनी 18,300 करोड़ रुपये का निवेश कर रही है।

कृष्णापट्टनम परियोजना की क्षमता 4,000 मेगावाट होगी। यह परियोजना आंध्र प्रदेश में लगाई जानी है।रिलायंस पावर सासन परियोजना के लिए बेहद तेजी से काम कर रही है। लगभग 3,960 मेगावाट क्षमता वाली यह परियोजना 2012 में शुरू करने की योजना बनाई गई थी। लेकिन इसका पहला चरण अब कुछ समय पहले ही शुरू किया जाएगा।

कंपनी बिजली परियोजनाओं को शुरू करने में अब कोताही नहीं बरत रही है। वह 2009-10 में रोसा बिजली परियोजना में उत्पादन शुरू करने वाली है। इसकी क्षमता 600 मेगावाट है।कंपनी देश की सबसे बड़ी निजी बिजली उत्पादक बनने के लक्ष्य पर काम कर रही है। मौजूदा परियोजनाएं शुरू होने के पास कंपनी के पास कुल 13 परियोजनाएं हो जाएंगी। उसकी कुल बिजली उत्पादन क्षमता 28,200 मेगावाट तक पहुंच जाएगी।

रिलायंस पावर हाल ही में अपने पहले सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) से जुटाई रकम का इस्तेमाल इस ऑर्डर में कर रही है। कंपनी ने जनवरी में ही देश के सबसे बड़े आईपीओ के जरिये 12,000 करोड़ रुपये जुटाए थे।हालांकि रिलायंस के प्रवक्ता ने इस मामले में कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया, लेकिन सूत्रों ने ऑर्डर की बात को बिल्कुल सही बताया है।

उनके मुताबिक देश में बिजली उपकरण बनाने वाली एकमात्र सरकारी कंपनी भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड इस ऑर्डर में कोई भी दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। दरअसल कंपनी के पास 10,000 मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए जरूरी उपकरण बनाने की क्षमता है। अपनी पूरी क्षमता के ऑर्डर वह पहले ही हासिल कर चुकी है। इसलिए अब उसे नए ऑर्डर नहीं चाहिए।?हालांकि वह क्षमता में 5,000 मेगावाट का इजाफा कर रही है, लेकिन यह काम 2009-10 से पहले पूरा नहीं हो पाएगा।

sources B.S.

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